Tuesday, August 2, 2011

चर्चा-ए-गोश्तखोरी -- बशीर अहमद और महात्मा नित्यानंद

सब्जीखोरी-गोश्तखोरी विषय पर चर्चा जो मौलाना हकीम बशीर अहमद और महात्मा नित्यानंद आर्य-समाजी के दरमियान हुई, जिसमें इस्लाम का बोलबाला रहा। अखबार ‘‘मुसलमान’’ अमृतसर ने उसी वक्त  (22नवम्बर 1910 ई. से लेकर 25 अप्रैल 1911 ई.) छापा और अब अलेहदा किताबी शक्ल में जमीमा (परिशिष्ट)के साथ लाया गया। प्रस्तुत पुस्तक इन्टरनेट www.archive.org में सुरक्षित उर्दू किताब ‘‘मुबाहिसा-ए-गोश्तखोरी’’ का हिन्दी रूपान्तर है
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Charcha Goshtkhori Swami Nityanand Debate Hindi

बिस्मिल्लाह हिर्रहमानिर्रहीम
अल्लाह ही वह जात है जिस के लिए सब तारीफें हैं उसने आदम को मिट्टी से बनाया  और उनसे हव्वा को और हव्वा और आदम से तमाम इन्सानों को पैदा किया और जिस तरह इंसान मिट्टी से पैदा हुआ है इसी तरह फिर एक रोज मिट्टी हो जायेगा इसी से (यानी मिट्टी से ) तुम को बनाया है और एक रोज वही तुम हो जाओगे।
हमारी हिदायत के लिए हमीं में से बडी-बडी हस्तियाँ पैदा कीं जिन को पैग़म्बर कहते हैं और उन को हर उमूर(कार्यों,फन) के मुतअल्लिक बतलाया गया और हुक्म दिया गया कि उन चीजांे को वह, हमंे सिखलायें  (ए रसूल जो कुछ हमने तुम पर उतारा है बिला कम व कास्त हमारे पैग़ाम पहुँचा दो।) जिसने उनका हुक्म माना वह निजात पाया और जिसने ना-फरमानी की वह गुमराह और अ़जाब में मुब्तला हुआ।
उन पैग़म्बरों के नायबीन मुक़र्रर हुए जो हमको दुनिया और आख़िरत की तालीम देते हैं जिनके मुतअल्लिक सिर्फ दुनिया के इन्तिजाम सुपुर्द किये गये वह बादशाह कहलाते हैं और जिन के जिम्मे दीनी यानी आखिरत के उमूर(फन,कार्यों) की दुरूस्तगी दी गयी वह आलिम हैं इसलिए इन दोनों के हुक्म पर चलना हमारा फर्ज है चुनांचे इरशाद होता है (ऐ ईमान वालो) हुक्म मानो अल्लाह का और हुक्म मानो रसूल का और जो इख़्तियार दिये गये हैं(मुसलमान बादशाह को)। इस आयत में अल्लाह और उसके रसूल और बादशाह-ए-वक्त का जिक्र है और जहाँ पर यह मौजूद न हों उनके नायब(उप,उत्तराधिकारी) की ताबेअदारी लाजिम है।
अल्लाह ने इन्सान को अशरफुल मख़्लूक़ात बनाया है जिसकी बिना पर वह सब मख़्लूक पर हर क़िस्म का हक रखता है। बशर्ते कि वह शराफत के रास्ते से क़दम बाहर न निकाले इसी बिना पर वह जानवरांे को जिस तरह चाहे काम में ला सकता है। मसलन उस पर सवारी कर सकता है। उसका दूध पी सकता है। उसकी खाल के जूते बना सकता है। और (कुएं से पानी निकालने के लिए) डोल तैयार कर सकता है। उसकी चरबी से चिराग़ रौशन कर सकता है। और मशीनों में बजाये तेल के काम में ला सकता है। उसके बाल ओैर हड्डी अपने मसरफ में सर्फ कर सकता है। और गोश्त भी खा सकता है मगर कोई तकलीफ उन को नही दे सकता और बिना खास जरूरत उनका एक बाल भी नही तोड़ सकता बल्कि उनकी हर तकलीफ को रफा करना उसका फर्ज है। उनको भूका या प्यासा रखना या सर्दी या गर्मी से ईजा(तकलीफ) देना सख़्त गुनाह है।
वह चीज बहतर है जो मालिक की मर्जी़ के मुताबिक हो और जो ख़िलाफ हो वह कैसी ही अच्छी मालूम होती हो वह बहतर नहीं है। मालिक की मर्जी का पता जब तक वह ख़ुद न कहे नही चल सकता।  और जो हस्तियाँ आला है वह अदना हस्ती से मुखातिब नहीं होती जैसे बादशाह या कोई बडा हाकिम वह जब बात करेगा तो ऐसी हस्ती से करेगा जिस का मर्तबा उसके बाद ही हो या दीगर अश्खास से बुजुर्ग हो। ख़ुदावंद तअ़ाला का भी यही हाल है कि वह अपने हर बंदे से बात नही करता बल्कि जो उसका बरगुजीदा बंदा होता हैं उसी से वह मुख़ातिब होता है जिसको पैग़म्बर या रसूल कहते हैं। बस रसूल हम को जो हुक्म दे वही मालिक की मर्जी के मुताबिक है और बेहतर है और हम कोई बात कैसी ही बहतर करें मगर क्यूंकि उसमें मालिक की मर्जी शामिल नही इसलिए वह हरगिज बेहतर नही हो सकती ।
नतीजा यह निकला कि मजहबी कुल उमूर(फन,कार्य, बातें) क़बिले तस्लीम हैं और उसके ख़िलाफ जुमला अहकाम और राये मरदूद। इस ऐतबार पर गोश्त का खाना क्यूंकि मजहबी तरीक़े पर दुरूस्त और जायज है इसलिए हरगिज उसमें चे मी गोई को दखल नहीं हो सकता और न किसी तरह का शक पैदा हो सकता है और न अख़लाक़ी ऐतराज हो सकता हैं और न तिब्बी बल्कि ऐतराज करना जिहालत और दीवानगी के मुमासिल है। ख़ुदा ने हम को साफ इजाजत गोश्त खाने की दी है चुनांचे इरशाद फरमाता है।
 और चौपायों में दो तरह के हैं एक लायक सवारी के और एक सवारी के क़ाबिल नही (जैसे छोटा ऊँट का बच्चा) खाओ उस चीज से जो रोजी दी अल्लाह ने तुम को, और पैरवी न करो शैतान के रास्तों की (खेती और जानवरों के हराम करने में) बे-शुबा शैतान तुम्हारा खुला हुआ दुश्मन है। पैदा किया अल्लाह ने चौपायों में से आठ किस्में।
भैड़  और दुंम्बे से  2 यानी नर व मादा
बकरी से         2 यानी नर व मादा
ऊँट से          2 यानी नर व मादा
गाये से          2 यानी नर व मादा
यह सब जानवर अल्लाह ने तुम्हारे खाने के लिए हलाल कर दिये हैं और बाक़ी आयत का मतलब यह है कि नाफरमान कुछ को हराम और कुछ को हलाल और कुछ का कुछ हिस्सा हराम बतलाते हैे वह कुछ चीज मानने की नही है तुम उन तमाम जानवरों को जिन का ऊपर नाम लिया गया ख़ुशी से खाओ।
ख़ुदा का शुक्र है कि उसने हमको नबाती पैदावार(सब्जी, गेहूं, दाल आदि) के अलावा हेवानी ग़िजा(मांस, मछली) के खाने की इजाजत दी और जो उनमें से नाक़िस(बेकार, नुक्सान देने वाली) और मुिजर(सेहत के लिए नुक्सान दने वाली) हैं उनको मना फरमा दिया जैसे ख़िन्जीर (सुअर)। और हलाल जानवरों के भी खाने के तरीक़े इरशाद फरमा दिये उसको हरगिज न खाना जो ख़ुद मर गया हो और न उसको जिसको किसी दरिंदे ने मार डाला हो क्योंकि यह उसी का हक है जिसने उसको शिकार किया हो अगर तुम उसका शिकार ले लोगे तो तुम में और उसमें जत-पेजार चल जायेगी नीज यह एक कम हिम्मती की भी निशानी है और बहुत से जानवरों में जहर भी होता है और इसी तरह जो ख़ुद मर जाता है वह भी अकसर बीमारी की वजह से मरता है
क्योंकि यह उसी का हक है जिसने उसको शिकार किया हो अगर तुम उसका शिकार ले लोगे तो तुम में और उसमें जत-पेजार चल जायेगी नीज यह एक कम हिम्मती की भी निशानी है और बहुत से जानवरों में जहर भी होता है और इसी तरह जो ख़ुद मर जाता है वह भी अकसर बीमारी की वजह से मरता है और अकसर बीमारियाँ जह़रीला असर रखती हैं। अगर इन्सान दूसरे का शिकार किया हुआ खाने लगता है तो उन जानवरों की नजरों में जलील हो जाता और वह उसको जयादा हलाक करने लगते। जो गै़र की कमाई पर बसर करते हैं वह कमाने वाले की नजरों में जलील रहते है। किसी जानवर का शिकार किया हुआ गोया उसकी कमाई है। मैं जरूर कहुँगा बिला शक दुनिया की और ग़िजाओं (खाने की चीजों) से गोश्त मंे हर क़िस्म के फवाईद(लाभ) जयादा हैं अलबत्ता उसको कम मिक़दार में खाना चाहिये। चूंकि मैं हर तरह गोशत खाना इन्सान का हक समझता हूँ। इसलिए जब मैं ने यह सुना कि कोई साहब आज गोश्त के लिए यह बयान दे रहैं हैं कि इन्सान उसके खाने का मुस्तहिक़(हकदार) नहीं है तो मुझसे खामोश न रहा गया और मैंने उस नाहक फैसले की फौरन तरदीद की और हक को जाहिर कर दिया और वह आपके सामने अगली सतरों में मसतूर होता है जिस मजमून को में हदिया नाजरीन कर रहा हूँ अलेहदा-अलेहदा यह मेरा मजमून अख़बार मुसलमान अमृतसर मंें मुबाहिसों के बाद ही शाये हो चुका है। 22 नवम्बर 1910 ई. से लेकर 25 अप्रैल 1911 ई. तक के पर्चाें में यह मजमून आप को मिल सकता है, जिसकी मुताबक़त अगर सन् हिजरी से की जाये तो 19 जीकादा 1328 हिजरी से लेकर 25 रबी-उस्सानी 1329 हिजरी तक होती है। क्यूंकि यह मजमून अपनी नोईयत का पहला मजमून था इसलिए मेरा ख़याल उसी वक्त से इसको अलेहदा किताबी शकल में शाए करने का था मगर ¦ हर काम के लिये एक वक़्त मुक़र्रर है अब तक इस की इशाअत का वक्त न आया था हालांकि मैं ने इस अर्से में दो किताबें और नब्बे(90) रिसाले अल मुआलिज(इलाज के सम्बन्ध में) के लिखकर शाए किये ताहम ख़ुदा का शु्क्र है कि यह किताब भी मेरी जिन्दगी ही में छप कर हदिया नाजरीन हो गयी।
....................फुटनोट...............
 हराम हुआ तुम पर मुरदार और ख़ून और गोश्त सुअर का और जिस चीज पर नाम पुकारा अल्लाह के सिवाये का जो मर गया घुट कर या चोट से या गिर कर या सींग मारने से और जिसको खाया फाडने वाले ने मगर जो तुम ने जिबह कर लिया (वह हलाल) है या जो जिबह हुआ किसी ..... (कुरआन)
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तम्हीद मुबाहिसा (प्रस्तावना)  
 मैं अपने डाक्टरी पेशे के लिहाज से हमेशा मजहबी बहस से दूर रहता हूँ, नवम्बर 1910 ई0 में एक इत्तिफाक़ी तौर पर यह मुआमला पेश आगया अगरचे यह एक मजहबी बहस थी मगर उसका जाहिरी रूख़ तिब्बी था इसलिए मैं ने उसको मन्जूर कर लिया। जुमे का दिन और ग्यारह बजे का वक़्त था मौहल्ले के एक अंग्रेजी जानने वाले तालिबे इल्म(विद्यार्थी) मेरे पास आये। मैंने पूछा कहाँ से आ रहे हो? कहा कि स्वामी नित्यानन्द और योगेंन्द्रपाल साहब आर्यो के नामी पंडित आये हुए हैं उनके जलसे से वापस आ रहा हूँ। मैं ने मजमून के मुतअ़ि़ल्लक दरयाफत किया तो कहा कि गोश्त-खोरी के मुतअल्लिक बयान था और तिब्बी तरीक़े पर यह साबित किया गया है कि गोश्त खाना जायज नही और नुक़सान देने वाला है। यह सुनकर मैं ने कहा कि अगर तिब्बी तरीक़े पर नाजायज साबित कर दें तो में गोश्त तर्क करने (छोडने) को तैय्यार हूँ........यह तालिबे इल्म दोबारा मग़रिब के वक़्त मेरे पास आये और स्वामी जी की तरफ से मुझे पैग़ाम दिया कि वह मुझसे गोशतखोरी(मांस खाने) के मुतअल्लिक तिब्बी तरीक़े(डाक्टरी दृष्टि) पर बहस करने को तैय्यार हैं और यह भी कहा कि जल्द आयें क्योंकि वह आज ही रात की गाडी से वापस रवाना होने वाले हैं ।
 जो कुछ मैं ने उन तालिबेइल्म साहब से दोपहर को कहा था उसका मक़सद यह न था कि में वाक़ई बहस करूँगा मगर उस वक़्त मेरे लिए सख़त जिल्लत थी अगर में उनके बुलाने पर नहीं जाता। क्यूंकि मैं पहले से उस काम के लिए तैयार न था। मैं ने दो-एक मिन्ट इस बारे में गौर किया तो यह बात मेरे दिल में आई कि अगर मैं हक पर हुँ तो जरूर कामयाबी होगी और क्यूंकि यह अमर मजहबी तौर पर जायज है और मजहब हमारा सच्चा है इसलिए कामयाबी का पूरा यक़ीन हुआ। मैं फैारन अकेला उस विद्यार्थी के साथ हो गया। बाद मिजाज पुरसी के मुझे सवाल करने का मौक़ा दिया गया। मैं ने अपनी तक़रीर इस तरह शरू की।

मुबाहिसा(चर्चा, शास्त्रार्थ) 
गोश्त-ख़ोरी के मुतअल्लिक मैं कुछ दलाइल बयान करना चाहता हूँ जिनको किसी मजहब से तअल्लुुक न होगा। फिर मैं ने कहा कि गोर करने से मालूम होता है कि आदमी की पैदाईश ख़ून से हुई है (और उसका तफसील से सुबूत भी दिया) और जब वह शिकम मादर(मां के पेट) से आया तो वह गोश्त का था (जमा हुआ खून गोश्त कहलाता है यानी जिस्म के अन्दर खून खास तरकीब से जम कर गोश्त बन जाता है) और इस वक़्त पर भी गोश्त ही का है।
जब वह शिकम मादर में था अपनी रोजी (ग़िजा) अपने कसब से हासिल न कर कसता था, कु़दरत ने उसकी रोजी वहाँ ख़ून मुक़र्रर की थी और और जब शिकम मादर से बाहर आया वह ग़िजा यानी ख़ून न मिलने की वजह से ब-मजबूरी दूसरी अश्या पर बसर करने लगा जिनको हम अपनी कम समझी से ग़िजा समझते हैं। मगर दर-हक़ीक़त यह उसकी ग़िजा(खुराक) नही है बल्कि इस वक़्त भी उसकी ग़िजा वही है जो कु़दरत ने उसको शिकमे मादर में मुक़र्रर की थी यानी ख़ून इस की तफसील यह है कि जो ग़िजा(खुराक) हम खाते हैं व जुज(हिस्सा) व बदन इन्सान नहीं होती बल्कि अव्वल उसका ख़ून बनता है फिर यह खून इन्सान के बदन की ग़िजा होती है। अतिब्बा(हकीमों) के पास ग़िजा की दो क़िस्में की गई हैं (1)गिजा बिल कूत (2) गिज बिल फ़ैअल
 गिजा बिल कूत वह हैं जो खुद ग़िजा नहीं होती बल्कि सलाहियत ग़िजा बनने की रखती है जैसे लकडी कि ख़ुद कोयला नही है बल्कि सलाहियत कोयला बनने की रखती हैं पस इसी तरह जो चीज कि खाई जाती है वह ख़ुद गिजा नहीं होती बल्कि गिजा बनने की सलाहियत रखती है। यानी गिजा बिल कूत जब गिजा बिल फैअल(ख़ून) बन जाती हैं तो जुजवे बदन इन्सान होती है। क्या जो चीज मैदे में जाये वह गिजा है? नहीं कोई शख्स भी कंकरियों को जो किसी तरह से गल्ले वग़ैरह के साथ पक कर मैदे में पहुंच जाती है गिजा(खुराक)नहीं कहता। दवा जो क़सदन पी जाती हैं गिजा नहीं कहलाती पस मालूम हुवा कि मेहज मैदे में दाख़िल होने की वजह से कोई चीज गिजा के नाम से मोसूम होने (मशहूर, जाने जाने) की मुस्तहिक नहीं होती बल्कि असल गिजा वह है जिससे बदन इन्सान का तग़जिया(परवरिश) हो और वह ख़ून है। पस साबित हुआ कि इन्सान की गिजा वही है जो रोजे़ अव्वल से ख़ुदा ने उस के लिए मुक़र्रर की है यानी ख़ून ओैर ख़ून बतरकीब खास जम कर गोश्त बन जाता है लिहाजा यह बात साबित हुई कि गिजाए इन्सान गोश्त है।
मजीद तफसील: आप इसी बात को दूसरे तरह यूं समझ लिजिये कि इन्सान की गिजा गोश्त ही हैं मगर क़ुदरत ने उस की आसानी के ख़याल से उस के जिस्म में एक ऐसी मशीन भी बना दी है जो गोश्त न मिलने की सूरत में दूसरी चीजों से गोश्त बना सकती है। इसी बिना पर अवाम को शुबा(शक) हो जाता है कि इन्सान की गिजा दूसरी चीजों से बनती है हालांकि जिस क़दर दूसरी अशया वह दाख़िले मैदा करता है वह सब ख़ून बनने के बाद गिजा(खुराक) होती हैं।
स्वामी नित्यानन्द साहब के एतराजात
(1) बच्चा मादरे शिकम(मां के पेट) में दूध पीता है ख़ून नहीं पीता।
(2) मौलवी साहब आदमी की पैदाईश खून से बतलाते हैं आदम की पैदाईश मिट्टी से है कु़रआन में मौजूद है।
(3) बगे़र जीव(जानदार) मारे गोश्त मयस्सर नही हो सकता और जीव का मारना जुल्म है और ख़ुदा की चोरी।
योगेन्दर पाल के एतराज
(4) मौलवी साहब के बयान से मालूम हुआ कि इन्सान की गिजा खू़न है और कु़रआन में ख़ून का खाना हराम है।
डाक्टर परभूदयाल साहब के एतराज
(5) कु़दरती गिजा इन्सान की गोश्त नही है। गोश्त-ख़ोर के दाँत इस तरह के और जबान उस तरह की होती है वगैरह-वगैरह।
जवाबात
(सवाल 1) बच्चा मादरे शिकम में दूध पीता है ख़ून नही पीता।
(जवाब 1) बच्चा शिकमे मादर मंें हरगिज दूध नही पीता यानी जनीन की गिजा हरगिज दूध नही होती। कोई डाक्टर हकीम या वैद्य इस अमर का क़ाइल नहीं आप किसी बच्चे की (वक़्त-ए-पैदाईश) नाफ जो उसकी गिजा का आला है काटकर मुलाहजा करलंे कि उसमें से ख़ून निकलता है या दूध।
दुध पिस्तान मंे बनता है और बनने के बाद कहीें और जगह वापस नही जाता। ख़ून ही का दूध बनता है पिस्तान की ख़ासियत और बनीरश ख़ून को दूध बना देती है अगर ख़ून बिल फर्ज किसी दूसरी जर्फ (शरीर के दूसरे हिस्से) में चला भी जाये तो दूध इस जर्फ की ख़ासियत हासिल कर लेगा जैसा कि आम क़ायदा है।
दूध एैसी गिजा है जिससे पाखाना बनता है अगर जनीन की गिजा दूध हुआ करती तो पाखाना की वजह से सख़्त मुश्किल हो जाती ।
दूध जिन्दा की गिजा है तीन माह तक जनीन मुर्दा होता है। दूध ऐसी गिजा है कि बग़ैर मैदे में दाखिल हुए हजम नही हो सकती और जनीन का मैदा काम ही नहीं करता और जो गिजा मैदे में जाकर हजम होगी उसमें पाखाना लाजमी तौर पर पैदा होगा। शिकम मादर(मां के पेट) में पाखाना का पैदा होना बिल्कुल मसलहत के खिलाफ है। पस यह कहना कि जनीन ख़ून से परवरिश नही पाता बल्कि दूध से पाता है हक़ीक़त के बिल्कुल ख़िलाफ है।
स्वामी नित्यानन्द साहब के दूसरे सवाल का जवाब
(सवाल 2) मौलवी साहब आदमी की पैदाईश खून से बतलाते हैं आदम की पैदाईश मिट्टी से है कु़रआन में मौजूद है।
का जवाब नम्बर 2                                  
मेंने जो कुछ कहा उस को हाजिरीन ने बख़ूबी समझ लिया और जो कुछ मेरा दावा था वह मैंने साबित कर दिया मगर अब आप आदम की पैदाईश का हाल भी सुन लो अल्लाह तअ़ाला फरमाता हैं े ž › ९ ८ ž ›   ž  ष्  Ÿ ष् ž  ž ¹ Ÿ दृ ञ ४ Ÿ ५ ˜ ž ¦ दृ š ¹ िं š ¤ › Ž  Ž Ÿ œ ञ  (मुझे इत्तिफाक़न यह आयत याद आई) देखिये अल्लाह तअ़ाला ने यह नहीं कहा कि मैंने आदम को इस मिट्टी से बनाया है (जमीन की तरफ इशारा कर के) जिसका बना हुआ बताते हो देखो लफ्जे ‘तीन’ के माअना(अर्थ) मिट्टी के हैंं उसके आगे लफ्ज ‘सलालता’ मौजूद है जिसके मअना छने हुए और ख़ुलासे के हैं जिसका मतलब यह हुआ कि अल्लाह तअ़ाला ने अव्वल मिट्टी से नबात  और नबात से हैवान बनाया पस इस तरह पर भी हमारा मतलब साबित हुआ और अगर आप इस बात के क़ाइल हैं कि आदम को इसी मिट्टी से पैदा किया तो फिर कोई झगड़ा ही न रहा हर चीज मिट्टी की हुुई गोश्त भी मिट्टी का हुआ। दाल भी मिट्टी की और तरकारी भी मिट्टी की और आप और हम भी मिट्टी के हुए।
स्वामी नित्यानन्द साहब के तीसरे सवाल का जवाब
(3) बगे़र जीव(जान) मारे गोश्त मयस्सर नही हो सकता और जीव का मारना जुल्म है और ख़ुदा की चोरी।
जवाब 3                                    
मैं यह नहीं कहता कि आप जीव मारें मैं सिर्फ इस क़दर कहता हूँ कि गोश्त इन्सान की ग़िजा(खुराक) है और इन्सान पहले दिन से आखरी दम(सांस) तक गोश्त ही खाता है।
सवालः-वेद में इलाज करना आया है या नही? (खा़कसार बशीर)
जवाबः-वेद में इलाज करना आया है (योगेन्द्र पाल)
सवालः-डाक्टर के क़ायदे के मुताबिक हर मर्ज कीड़ों से पैदा होता है (ख़ाकसार)
जवाबः-यह सही है (डाक्टर प्रभुदयाल साहब)
नतीजाः- आप की समझ में आ गया होगा या मैं अर्ज करूं मर्ज का बाइस(कारण) कीडे़ हुए और मर्ज का इलाज करना कीडों का मारना हुआ जो वेद (जो आप के अक़ीदे के मुताबिक आसमानी किताब है) से साबित है और वेद आसमानी किताब होने के लिहाज से जुल्म की तालीम नही दे सकती । पस साबित हुआ कि जीव हत्या जुल्म नही है
नोटः-सवालात के जवाबात तो वह खूशी से देते रह मगर जब नतीजा निकला तो बेचारे परेशान हो गये  और यह कहने लगे ।
जवाब
जालिम का मारना जुल्म नहीं जैसे शेर, साँप का मारना (नित्यानन्द)
जवाबुल जवाब (जवाब का जवाब)
गाय और बकरी जो घास के साथ अकसर बारीक कीडे यानी नन्हे जानवर खा जाते हैं वह जानवर ख़ुदा से फरियाद करते हैंं कि तू उनसे हमारा बदला ले, तो ख़ुदाई फैसला गाय और बकरियों को गोश्तखोरांे के सुपुर्द कर देता है वह उनको खा जाते हैं इस तरह पर गाय और बकरियों का खाना जुल्म नही बल्कि एक इन्साफी फैसले की  बिना पर है (ख़ाकसार)
योगेन्दर पाल के सवाल का जवाब
सवाल (4) मौलवी साहब के बयान से मालूम हुआ कि इन्सान की गिजा खू़न है और कु़रआन में ख़ून का खाना हराम है।
जवाब नम्बर 4
मैं पहले भी बयान कर चका हुँ कि जमा हुआ ख़ून गोश्त होता है जो हराम नहीं है।
अब में गै़र जमे हुए ख़ून के मुतअल्लिक अर्ज करता हुँ इसको जहर या कोई ख़राब चीज होने की वजह से खाने से नहीं रोका गया जैसा कि आपका ख़्याल है बल्कि एक मसलहत से मना किया गया वह मसलहत साफ है कि गोश्त खाने वाली क़ौम अगर ख़ून भी पीने लगेगी तो गैैैै़र गोश्तखोर क़ौम पर इस क़दर ग़ालिब आजायेगी कि उसे नेसत व नाबूद कर देगी और चुंकि ग़ैर गोश्तख़ोर क़ौम से उस की ख़िदमत कराना है इसलिए बक़ा की जरूरत भी।
 इसके बाद स्वामी जी यह कह कर बग़ैर जवाब अदा किये उठ गये कि मुझे रेल पर जाना है।
डाक्टर प्रभूदयाल साहब के सवाल का जवाब
(5) कु़दरती गिजा इन्सान की गोश्त नहीं है। गोश्त-ख़ोर के दाँत इस तरह के और जबान उस तरह की होती है वगैरह-वगैरह।

जवाब नम्बर 5
इस का जवाब दौराने तक़रीर में मुफस्सल आ चुका है यानी हर जानदार के मुताल्लिक ये साबित किया जा चुका है कि उसकी ग़िजा खून है, मुबाहिसा खत्म हुआ।
फकत
नोटः इस सवाल यानी दाँतों से मुताल्लिक तफसीली जवाब आगे जमीमे के जवाब नम्बर 2 में पढें।

जमीमा (परिशिष्ट)
जिस वक़्त में दो मुअजिजज मेहमानों से मुखातिब था मेरे दोस्त डाक्टर प्रभुदयाल साहब ने आर्य मेहमानों की कमजोरी मेहसूस करके मुझे अपनी तरफ मुतवज्जे करना चाहा मगर मैंने उनको यह कह कर टाल दिया कि मैं इस वक़्त अपने मेहमानांे से बाते कर रहा हुँ कल जिस क़दर वक़्त लेना चाहेंगे देने को हाजिर हुँ दूसरे रोज हस्बे वायदा उनके सवालात के जवाबात लिख कर भिजवा दिये और वह भी अख़्बार ‘मुसलमान’ अमृतसर में मुबाहिसे के साथ ही शाये हो गये। आगे वह सवालात और उनके जावाबात दर्ज किये जाते हैं।
डाक्टर प्रभूदयाल साहब का सवाल नम्बर 1
चौपाये गोश्तख़ोर जबान चाट कर पानी पीते हैं और नबातखोर(पेड, पोघे, घांस खाने वाले) चुस्की से, इन्सान भी चुस्की से पानी पीता है। इसलिए गोश्तखोर नहीं हुआ।
डाक्टर बशीर साहब का जवाब नम्बर 1
(अ1)  जबकि दीगर गोश्तखोर भी चुस्की से पानी पीते हैं जैसे चूंहा, नेवला, (मंगोस) तो इन्सान बिला शक गोश्तख़ोर हुआ (आपके जाल को आप ही के चूहों ने कुतर ड़ाला)
(अ2) नबातखोर मुंह लगाकर पानी पीते हैं और इन्सान चुल्लु से पानी उठा कर पीता है। लिहाजा नबातखोर(शाकाहारी) न हुआ।
(अ3) पीने से खाने का जिक्र मुक़द्दम था जिस को आपने बिल्कुल तर्क कर दिया।            
नोटः- अगर यह मजहब इस अमर का क़ाइल है कि जो इन्सान इस जन्म में सजा के काम करता हैं। उस जन्म में सजा पाता है और सजा के तौर पर जानवरांे का जन्म लेता है। इस क़ायदे से आर्याें को हम से गोश्तख़ोरी पर कोई मुखालफत न करना चाहिये।
(अ-4)सुनिये! जिस क़दर नबातखोर(शाकाहारी) हैं वह मुंह से ही अपनी गिजा खाते हैं हाथ से मदद नही लेते मगर गोश्तखोर खाते वक़्त जरूर हाथ से मदद लेते हैं और गिजा चबा-चबा कर खाते है इन्सान गिजा खाने मंे (1)हाथ से भी मदद लेता है और (2) चबा-चबा कर भी खाता है गोया इन्सान खाने मंे गोश्तख़ोर से पूरा मुशाबह(जैसा) है।
बरअक्स इसके अगर थोडी देर के लिये यह तस्लीम करलें कि ंइंसान चुस्की से पानी पीता है इसलिए वह नबातख़ोर(शाकाहारी) है तो भी मुशाबहत पूरी नही चुकि इन्सान पानी हाथ में लेकर पीता है। खुसूसन जबकि दीगर गोश्तखोर भी चुस्की से पानी पीने वाले मौजूद हों।
पस अगर इन्सान का गोश्तखोर होना ,खाने पीने पर आप के नजदीक मुन्हसिर है तो इन्सान बिला-शक गोश्तखोर साबित हुआ।
(अ-5) जब कि आप ने खाने पीने का जिक्र दलील में पेश किया हैं  तो पाखाना का जिक्र भी जरूरी है गौर से देखिये गोश्तख़ोर झुक कर पाखाना करते हैं और इन्सान भी झुक-कर रफे हाजत करता है और नबातख़ोर खडे-खडे गौबर करते हैं लिहाजा इन्सान गोश्तखोर हुआ।
मुहलांिहजा फरमाइये के गोश्तखोर के पाखाने मे बदबू होती है और इन्सान के पाखाने मे भी बदबू होती है नबातखोर के पाखाने मे बदबू नही होती। लिह़ाजा इंसान गोश्त खोर हुआ।              
नोटः- अगरचे यह एक मामूली बात मालूम होती है लेकिन अगर इसपर गौर किया जाये तो यह एक ऐसी बात है कि इस के मालूम होने के बाद कोई इन्सान को नबातखोर नहीं कह सकता डाक्टर साहब इस तशरीही मसअले को खूब समझ लेंगे ।
(अ-6)-गोश्त खौर मकान बना कर रहता है नबातखोर बगेर  मकान बनाये रहते हैं यह मसला अजहर मिनश्-शम्स(सूरज से अधिक रौशन) है लिहाजा इन्सान चंुकि गोश्तखोर के मुशाबह(जैसा) हैं गोश्तखोर हुआ।
(अ-7)-स्वामी नित्यानन्द ने मुझे कहा था कि इन्सान चोरी करता है दर-हक़ीक़त चोरी करना भी गोश्तखोरी का खास्सा हैं बिल्ली, कुत्ते, शेर आदमी सब इस काम में यकसाँ मुब्तला हैं लिहाजा इस ऐतबार से भी इन्सान गोश्तखोर हुआ।
आप को जो श्ुाबा था जिसकी वजह से बेचारे इन्सान को जो शेर की हमसरी का दावा रखता है बल्कि हमेशा उस से बाजी ले जाता है एक बकरी के क़िस्म का तसव्वुर कर लिया था दफा हो गया क्योंकि मैंने आपके एक दावे को सात तरह पर समझा दिया और हर एक का ऐसा जिन्दा सुबूत दिया कि जो रोजाना आपकी आँखों के सामने मौजूद है।
सवाल नम्बर 2
गौेश्त खौर के दाँत नुकीले होते हैं और जो गोश्त नही खाते हैं उनके चपटे होते हैं मसलन गाय, भैंस आदि।
जवाब नम्बर 2
(1) आप का तर्जे़ सवाल बताता है कि इन्सान के नुकीले दाँत नहीं होते, यह कि उसके सिर्फ चपटे दाँत होतंे हैं तअ़ज्जुब हैं कि डाक्टर होकर तशरीह के ख़िलाफ कह रहे हैं इसका जवाब जो कुछ मंे दूंगा वह तो बाद को दूंगा अव्वल डाक्टरी और तिब्बी कुतब से मजमून पेश करता हूँ जिस से नाजरीन खुद ही फैसला कर लेंगे कि इंसान के दाँत गोश्तखोरों जैसे हैं या नहीं।

अज रोये तिब्बे क़दीम (अर्थात पुरानी हिकमत की पुस्तकों से)
नाम न्न सनाया, शक्ल न्न  च ोडे, तादादः 4 अदद-हर कतार में 2-2, महल्ले वु़कू यानि कहांः दातों की हर कतार के दरमियानी हिस्से में वाके़ हैं, ग़र्जः चीजो के कुतरने  और काटने की गर्ज से पैदा किये गये हैं।
नाम न्न रूबाइयात, शक्ल न्न  चोडे, तादादः 4 अदद-2 नीचे  और 2 ऊपर की क़तार में, मेहल्ले वु़कू यानि कहांः सनाया के एतराफ यानि बराबर में,ग़र्जः चीजो के कुर्तरने  और काटने की गर्ज से पैदा किये गये हैं।
नाम न्न अन्याब, शक्ल न्न   मोटे नोकदार, तादादः 4 अदद 2 नीचे और 2 ऊपर की पंक्ति में, मेहल्ले वु़कू यानि कहांः रूबाइयात के एतराफ यानि बराबर में, ग़र्जः सख़्त चीजों को तोड़ ने के लिये
नाम न्न तवाहन, शक्ल न्न  चपटे, तादादः16 अदद 8 नीचे और 8 ऊपर की क़तार में, मेहल्ले वु़कू यानि कहांः अन्याब के एतराफ यानि बराबर में,   ग़र्जः चीजों का पीसना उन का काम है
नाम न्न नवाजिज,शक्ल न्न चपटे, तादादः 4 अदद 2 नीचे और 2 ऊपर,, मेहल्ले वु़कू यानि कहांः तवाहन के अतराफ में, ग़र्जः चीजों का पीसना उन का काम है
अज रूए तिब्बे जदीद (अर्थात नयी हिकमत की पुस्तकों से)
दाँतों के नाम या किस्म मआनी तादाद गर्ज
1. नाम न्न इन्साइज टीथ, सामने के दाँत, 8 अदद ,चीजो के कतरने और काटने की ग़र्ज के लिए
2. नाम न्न के नाइन टीथ, कुचलियां, 4 अदद, काटने की ग़र्ज के लिए
3. नाम न्न कसपड टीथ, अगली दाढ़ हैं, 8 अदद,सख़्त चीजों केे तोडने के लिए
4 नाम न्न मोलर टीथ,पिछली दाढ हैं, 12 अदद सख़्त चीजों केे तोडने के लिए।
क्या एैसे दो मुअजजज गवाहों के बाद कोई कह सकता है कि इन्सान के नोकदार दाँत नही होते या सिर्फ चपटे होेते हैं अगर आप मुहक़्िक हैं तो आईना लेकर खुद अपने दाँत मुलाहजा कर लिजिये अगर चार दाँत दो नीचे और दो ऊपर नोकदार हों तस्लीम कर लिजिये वरना दोबारा हम से दरयाफत फरमा लिजिये।
(2)  और अगर इस सवाल नम्बर 2 से आप का यह मतलब हो कि चुंकि इन्सान के नोकदार दाँत मिस्ल गोश्तखोंरों के नही हैं इसलिए वह गोश्त खाने का मुस्तहिक नही हो सकता। में अर्ज करूँगा कि जिन उसूल से वह छालिया और बादाम वगै़रह के खाने का मुस्तहिक तस्लीम किया गया हैं उन्हीं उसूल से वह गोश्त खाने का मुस्तहिक समझा जायेगा क्यांेकि वह अपने दाँतों से उन चीजों को भी नही तोड सकता है।
(3) क्या गोश्त को आपने ऐसा समझा है कि उस के खाने के लिये नोकदार दाँतों की जरूरत हैं हरगिज नही बल्कि उस के खाने के लिये तो किसी क़िस्म के दाँतों की जरूरत नही बाज, शिकरा, चील वगेरह उसके शाहिद हैं।
(4) मैं आप की इस तहक़ीक को कि आप ने यह महसूस किया कि गोश्तखोर के नोकदार दाँत होते हैं। निहायत क़दर की निगाह से देखता हुँ मगर साथ ही शिकायत असल अमर की है कि आपने यह न सोचा कि यह नोकदार दाँत उस को कु़दरत ने किस ग़र्ज से दिये हैं। क्या आप ने यह समझा है कि यह नोकदार दाँत उस को गोश्त खाने के लिये दिये गये हैं। नही बल्कि शिकार की गिरिफ्त और हड्डी तोडने के लिये दिये गये हैैंं और यह एक मुशाहदे की बात है। इस से आप इन्कार नहीं कर सकते ।
(यह है हड्डी तोड जवाब)
आप इन फुजू़लियात में वक़्त जाये न कीजिये अगर आप की मजहबी किताबों में गोश्त की ना मौजूद है तो खाइये या न खाइये मगर खाने वालों से झगडा न फरमाइये आप की मजहबी कुतुब में तो जायज लिखा है।
(5)  मुलाहजा किजिये कि आप ने इन्सान को नबातखोर साबित करने के लिये जो तफसील पेश की है वह कैसी बे-उसूल और अ़ारजी हैं कि असल पैदाईश से उसको कोई तअल्लु़क ही नही यानी दाँत इन्सान को न पैदाईश से होते हैं और न आख़िर वक़्त तक रहते हैं बल्कि दरमियान में भी जब चाहे उनको अलेहदा कर सकते हैं और उनकी जगह दूसरे लगा सकते हैं जो इन हड्डियों को अपने मुंह के अन्दर रखना चाहें वह पत्थर के लगवा सकता हैं (क्या आप इन्हीं दाँतों पर नाजाँ थे) इन्सान के वह दो जमाने जिन में यह पोपला बग़ैर दाँत के होता है आप उसको नबातखोर कहंेगे या गाश्तखोर। आपके क़ायदे से उन वक्तों में न नबातखोर कहला सकता है। और न गोश्त खौर फिर क्या उस वक़्त उसको जमादखोर कहना चाहिये क्योंकि दुनिया मंें यही तीन चीजंें हैं हैवानात, नबातात, जमादात यह है आप के सवाल की तरदीद और उस का दन्दाँ-शिकन जवाब ।
(6) जाहिर हैं जिस वक़्त इन्सान पैदा होता है उस वक़्त उसके दाँत नही होते उस वक़्त उसकी क्या गिजा होती है? क्या यही घास-फूंस नबात वह खाता है? उसके खाने के लिये कु़दरत ने दूध पैदा किया है और उस दूध मंें एक इशारा छुपा है जिनको एहले जमीर समझते हैं। सूनो ! कु़दरत ने जो उसकी ग़िजा शुरू में दूध मुक़र्रर की हैं। यह हैवानी गिजा है नबाती(शाकाहारी) या जमादी(पहाड, पत्थर) गिजा नही हैं जो इस अमर की दलील है कि उसकी गिजा हैवानी मुक़र्रर की गई है। कुदरत को जिस जीने पर चढ़ाना मन्जू़र था उसकी पहली सीढी पर चढा दिया। पस जो उस इशार-ए-कु़दरत को न समझे वह घास-फूंस कुछ ही खाता रहे कु़दरत का उसमें कोई कु़सूर नही।
ऐतराज(ख़ाकसार बशीर)
तो क्या दीगर अशया खुरदनी बिल्कुल हराम हैं नहीं उनको भी तन्कु़ल किजिये मगर तनावुल इसी को फरमाइये यानी बतौर असल ग़िजा गोश्त हो और बतोर तफरीह तबा व परहेज दूसरी अशया ।
वसअत(तफसील से)
अगर गोर किया जाये तो कुल हेवानात की इब्तिदाई गिजा हेवानी गिजा पाई जाती हैं। इब्तिदाई जमाने से ख्वाह वह जमाना लिया जाय जब कि वह अण्डे या रहम में जानदार का ख़िताब पा लेता है या इस  जमीन पर आने का इब्तिदाई जमाना लिया जाये।
अब में यहाँ पर चंद ऐसी मिसालेें पेश करता हूँ जो हक़ीक़तन तो मुवाफिक हैं मगर बादी उन्जर मंे खिलाफ मालूम होती हैं यानी चंद ऐसे जानवर हैं जो पैदा होते ही दाने चुगते नजर आते हैं मगर गोर करने से यह राज खुल जाता है। चुनांचे
कबूतर का बच्चा
उस के मुतअल्लिक भी यही ख्याल किया जाता हैं मगर उसकी हक़ीक़त यह है कि तीन रोज तक कबूतर अपने बच्चे को कुछ नहीं चुगाता सिर्फ अपनी खाली चोंच उस के मंुह में डाल कर निकाल लेता है। जिसको हवा खिलाना कहते हैं। यह वह हाल से खाली नही हैं या वाक़ई कुछ नही खिलाता या थोडी बहुत अपने मंुह की रतूबत उसे चटा देता है उस दूसरी सूरत में तो कोई ऐतराज ही नही पहली सूरत के मुतअल्लिक तिब्बी मसअले हैं कि जब हेवान को कोई गिजा नही मिलती तो उसके जिस्म की वह रतुबत जो बतौर जखीरे के मौजूद होती है गिजा का काम देती है। पस जिन जमाने में कबूतर अपने बच्चे को फाक़ह कराता है वह रतुबत उसकी गिजा बनती है और उस फाक़ह से कबूतर की ग़र्ज़ भी यही होती है कि वह जख़ीरे शुदा रतुबत उसके जिस्म में फना हो, हमेशा उडने के काम दे (जो रोजा नही रखते उन को कबूतर जितनी भी अक़ल नही हैं) मालूम होता है कि यह रतुबत उस के जिस्म में इस कसरत से होती हैं कि तीन दिन के फाक़ह का बोझ उस पर जयादा नहीं होता (एक अजीब इन्किशाफ फालिज का सबब भी यही जा़यद रतुबत होती है और इस मर्ज मंे फाक़ा सब सब बहतरीन इलाज तस्लीम किया गया है और कबूतर का गोश्त और उसका ख़ून भी मुफीद है। शायद उसका सबब यही फाक़ा हो पस में कहुँगा इन्सान को भी चाहिये कि वह अपने बच्चे को जहाँ तक मुमकिन हो इब्तिदा मंे फाक़ा कराया करें। पस अगर हमसे सवाल किया जाये कि कबूतर का बच्चा तीन दिन तक क्या खाता है तो हम जवाब देंगे कि हेवानी ग़िजा जो कि उसके जिस्म मंे बतौर जख़ीरा मौजूद थी। उन तीन दिन के बाद कबूतर चुगाना शुरू करता है जिसमंें बडा हिस्सा हेवानी गिजा का होता है यानी जो दाना वह अपने पेट से उगल कर चुगाता है उसमें उसकी मुन्ह़जम रतूबत भी शरीक होती है। पस मालूम हुआ कि पहली गिजा जब वह अण्डे के अंदर था बिल्कुल हेवानी थी और जब वह जमीन पर आया जिन मंे उसको फाक़ा करना पडा वह भी हेवानी थी  और तीन रोज के बाद की गिजा जो दाने की शकल में दी गई है वह भी मुरक्कब ब हवानी गिजा है।
कौआ
 अपने बच्चे को जयादा अर्से तक कोई गिजा नही देता इस खयाल से कि वह उसको अपना बच्चा नही ख्याल करता मगर क्या खालिके़ हक़ीक़ी राजिके़ बरहक किसी से बेख़बर है हरगिज नहीं। वह उनके लिये उनके हज्म के मुवाफिक उन्हीें के घोंसले में नन्ही-नन्ही मख़लूक यानी मच्छर पैदा कर देता है और जब वह भूख से बेताब हो कर चींखता है और ऊपर को जोर से सांस लेता है यह मच्छर उसके हलक के रास्ते से उस के मैदे में दाख़िल हो जाते हैं  और गिजा का काम देेते हैं। खुदा यूँ करता हैं उन बे-परों की परवरिश देखा आप ने , खुदा की रजजाक़ी को और परिंदों की हेवानी खुराक को।
मुर्ग़ का बच्चा
यह जंगल में तो मिसल अपने हम-जिन्सों तीतर, बुटेर, कौआ वगैरह की तरह पैदा होने के बाद नन्हे कीडों पर बसर करता है अलबत्ता हमारे घरों में कीडे उस को मयस्सर नहीं आते है इसलिए मजबूरन मुर्गी दाना चुगाती है मगर इब्तिदाई पैदाइश की खुराक उसकी वही हेवानी गिजा है जो उसको अण्डे के अंदर मिलती है नीज इस आलम मजबूरी मंे जिन दानों को यह चुगता है अव्वल मुर्ग़ी उस दाने को लेकर अपनी दहन की रतूबत से उसे तर कर देती है इसके बाद वह बच्चा उसको चुग लेता है। गोया उस वक़्त भी वह गिजा हेवानी मुरक्कब होती है मगर ऐसी बारीकियँा दाना समझ सकते हैं  और जो लोग ऐसे उमूर के सोचने के आदी नही हैं वह बगै़र समझायें नही समझ सकते।
नतीजा
आम तौर पर परिन्दे कीडे खाते हैं या शिकार मार कर बसर करते हैं कुछ परिन्दे जिनकी जाहिरी हालत से श्ुाबा हो सकता था उनका तजकरा कर दिया गया लिहाजा यह बात बख़ूबी रौशन हुई कि हर परिंदे की इब्तिदाई गिजा भी हेवानी गिजा है जो एक  इशारा है उनके लिये हेवानी गिजा मुक़र्रर होने का कु़दरत से।
हशरातुल अर्ज़(जमीनी जीव-जन्तु)
जयादा-तर उन की पैदाईश अण्डे से है जिसका बयान हो चुका कुछ़ बच्चा देकर दूध पिलाते हैं उनका बयान भी गुजरा बअज ऐसे हैं जो बच्चा देते हैं मगर उसको दूध नही पिलाते, जैसे बिच्छू उसका बच्चा पैदा होते ही अपना ठिकाना अपनी माँ की पीठ पर बना लेता है  और उसी को चाट कर एक हफ्ता गुजारता है, इसके बाद नीचे उतरता है। उसकी माँ अपने लुआबे दहन(मुंह की राल) से मिट्टी तर कर के देती है यह उसको चाटता है। यह गिजा उसको ब-नजर एहतियात खिालाई जाती है वरना बिच्छू नन्हीं-नन्हीं मख़्लूक़(कीडे आदि) पर गुजर करने वाला है।
जाती तजुर्बा
मादा बिच्छु एक माह से जयादे अर्से तक हामिला रहती है, बच्चे क़रीब तीस चालिस देती है। पैदा होते ही यह अपनी माँ के जिस्म पर सवार हो जाते हैं और रात दिन पुश्त(पीठ) पर चिम्टे हुए रहते हैं, माँ अपना लुआब डंक इनके ऊपर बग़र्ज़ हिफाजत किये हुए रहती है और इस तरह तैय्यार रहती है कि ख़तरा महसूस होते ही चल दे और उसके बच्चे भी ऐसे होशियार रहते हैं कि चलने के वक़्त उनको किसी इशारे की जरूरत नही होती ग़ालिबन ख़तरे के डर से वह उनको किसी वक़्त पुश्त से जुदा नही करती बिच्छू के बारे में जो यह बयान किया जाता है कि बच्चा उसके शिकम को चाक करके निकलता है और एक बच्चा पैदा होने के बाद माँ मर जाती है यह सही नही हैं मेंने  मादा को एक माह तक जिन्दा देखा उस के बाद वह किसी बे-एहतियाती की वजह से मौत का शिकार हो गई।
दरियायी जानवर
सिवाये वहेल के सब अण्डे देते हैं वहेल दूध पिलाती हैं सो उनका तजकिरा पूरे तौर पर गुजर चुका और साबित हो चुका कि उन सब की इब्तिदाई गिजा हेवानी गिजा है और दरियायी मछलियों को सिवाये दूसरी मछिलयों के कोई और गिजा मिल भी नही सकती  ।
रिजल्ट
लिजिये साहब मुशाहिदे ने तो यह साबित कर दिया कि इब्तिदाई गिजा इंसान की बल्कि जुमला हेवानात की हेवानी हैं चाहे वह दरिन्दा हों या परिन्दा हो। चरिंदे हों या खजिंदे हों बररी हांे या बहरी हों जबकि वह अपनी असल फितरत पर होता है और कोई चीज दुनिया की उसने खानी सीखी हो ।
मुशाहिदाः- तो पुकार-पुकार कह रहा है किः
हेवान हेवान की गिजा है
नबात नबात की गिजा है
हेवान की असल ग़िजा हेवान हैं। सिखलाने से दूसरी गिजा खाना सीख जाता हैं। हेवानों में कोई ऐसा हेवान नजर नही आता जो दूसरे हेवान की गिजा न हों यह अमर दूसरा है कि कुछ हेवान अपनी होशयारी से अपनी जिंदगी तक ख़ुद को दूसरे का लुक़मा न हो ने दे मगर दूसरा उसको लुक़मा करने की फिकर में जरूर हैं और बाद मरने के तो जरूर दूसरांे की गिजा का लुक़मा(भोजन) हो जाता है, जिस तरह इंसान को चींटी और शेर को गिद्ध खा जाते हैं और इसी तरह जुमला(तमाम) हेवानात(जानवरों,परिन्दों आदि) का हाल है।
सुनिये! और गोर से सुनिये कि एक छोटा-सा जानवर जिसका जिस्म कुत्ते से बडा नहीं होता। हाथी को अपना शिकार बनाता है वह एक ही जस्त में हाथी की पुश्त पर सवार हो जाता है और उसका दिमाग़ निकाल कर खा जाता है और हाथी जैसा फील तन मुरदा होकर लोमडी, गिद्ध और चींटी की गिजा(खुराक) बन जाती है मुलाहिजा फरमाया आपने कि हाथी और चींटी की खुराक हो? अगर यह फितरत का मुक़्तजा नही तो और क्या है यह एहले अक़ल को बहुत बडा इशारा है।
हाँ और सुनिये और हेवान जयादातर इन्सान की गिजा(खुराक) हैं मगर उनमें से हिन्दू क़ौम ने जयादा वह हिस्सा अपने लिये जायज कर रखा है, मुसलमान बेचारे चंद किस्म(तरह) के हेवान ख़रीद कर खा लेते हैं। और हमारे हिन्दू भाई उस ख़रीदारी के फायदे में सहीम बन जाते हैं मगर हिन्दू क़ौम जिस क़दर हेवान हैं उन में से एक भी नही छोडते। सुअर, सांड, साँप, शै, शिग़ाल गैंण्डा, कुत्ता, बिल्ली, गर्ज़ कि जिस क़दर मुफत और मुर्दार और नापाक, सडे सडाये जानवर हैं सबको हडप कर जाते हैं और कभी जरूरत हो तो ख़रीदने से भी दरेग़ नही करते ।
अगर हिन्दू धर्म की किताबों के हवाले उस के मुतअल्लिक दरकार हों तो आख़िरी बाब(उर्दू वाले एडिशन) मंें मुलाहजा फरमा लें। कहिये जनाब खिताब सही हैं या नही  अगर उन चीजों के खाने वाले हिन्दू क़ौम के नही हैं तो इस अमर का आप ऐलान कर दें ताकि हम उनको हिन्दू न कहें बल्कि हम भी आप की तरफ से इस बारे में कोशिश करें कि यह नापाक और मलहिया का़ैमें खारिज कर दी जायें । उम्मीद है कि आप कामयाब होंगे जरूर कोशिश फरमायें।
अच्छा याद आया एक ऐसा भी जानवर हैं जिसको आप की क़ौम नहीं खाती जिसकी वजह यह है कि उसको खालिक ने अपने खास बंदों के लिये रिजवर्ड मखसूस कर दिया है
क़िस्मत क्या हर एक को क़स्साम अजल ने
जो शख्स जिस चीज के क़ाबिल नजर आया
मुर्दार किसी को तो ख़िंजीर किसी को
लहम हम को दिया जो अत्यब नजर आता
  तक़दीरे अमर का किसी को चारह नही ता हम दुआ करेंगे ।
सवाल नम्बर 3
  गोश्तखोर दिन में कम देखते हैं और रात में जयादा, नबात खाने वाले दिन में जयादा और रात में कम इस से मालूम होता है कि इन्सान गोश्तखोर नहीं है।
जवाब नम्बर 3
हरगिज ऐसा नही है चील, कौअेे, बाज, शिकरा(लंबी चोंच से मछली का शिकार करने वाला) वगेरह सब गोश्तखोर हैं। मगर मुत्लक रात में नही देख सकते बरअक्स इसके दिन में मीलों के फासले से अच्छी तरह से देख सकते हैं ।
गोश्तखोर चोपाये भी रात में हम से जयादा हरगिज नहीं देख सकते इस फअल में बलिहाज फितरत वह हमसे किसी तरह तफ्व्वुक(बढोतरी, बरतरी) नही रखते। किसी का रात को कम देखना ओेैर किसी का दिन में कम दिखना यह सिर्फ मशक से तअल्लुक रखता है, इन्सान ने ब-वजह आराम के रात को काम करना छोड रखा है और चौपायें ब-वजह दरिन्दों के खौफ के रात को नही चलते फिरते और इसी तरह दरिंदे इन्सान के खौफ से दिन को नही निकलते। तीतर इस वजह से दिन को नही बरआमद होते कि दूसरे जानवरों पर उनको छापा मारने का मौक़ा कम है। ग़र्ज जो रात में अशग़ाल मे मशगूल रहता है वह रात में बखूबी देख सकता है और जो दिन में कारोबार करने का आदी है वह दिन में फितरत को उस से कोई तअल्लुक नही है। चुनांचे बिल्ली बखूबी देख सकती है और चोर रात को अन्धेरे में सब-कुछ करता है। इन्सानेां मंे बहुत-से ऐसे इन्सान हैं जिनको ऐनक की आदत हो गयी  है। वह बगै़र ऐनक के कुछ नही देख सकते। ग़र्ज़ कि आदत और चीज है। और फितरत और आदत को फितरत समझना सख़्त ग़लती हैैं। यह कहना कि गोश्तखोर रात में जयादा देख सकता है उस वक़्त तक क़ाबिले तस्लीम नहीं जब तक कोई गोश्तखोर इन्सानी जन्म लेकर गवाही न दे। बशर्तेकि उसको भी याद हो कि वह अगले जन्म मंे फुलाँ किसम का गोश्तखोर था। आपने अपने दावे के सुबूत मे कोई दलील पेश नही की आइये हम आपको एक बात बतलाते हैैंं जो एक रौशन दलील मालूम होती है यानी गोश्तखौर की आँख का रात में चमकना नजर आना और रात ही में शिकार करना। चुंकि वह दूसरे के माल पर छापा मारता हैं इसलिए रात को शिकार करता है इन्सान की भी यही हालत है वह भी रात में चोरी करता है आँखों का चमकना उसके गोश्तखोर होने की दलील नही बल्कि साफ उस के हड्डी खाने की दलील हैं क्योेंकि उसकी आँखों की यह चमक हड्डी खाने की वजह से पैदा होती हैं हड्डी मंें मादाये फासफोरस होता है। जिसका यह खास्सा है कि वह रौशन होता है और हवा से मुशतअल हो जाता है और हड्डी में निकलता है।
अब  में अंधेरे में देखने के तरीक़े बयान करता हुँ ताकि इस फेअल के साथ हजरत का श्ुाबा निकल जाये। चंद रोज रोशनी देखना छोड दें न सूरज की रोशनी देखें और न चिराग़ की बस बाद चंद रोज के अंधेरे में देखने की मशक हो जायेगी। इसी तरह बिला मश्क अगर लेट कर देखा जाये खुसूसन मैदान में रात के वक़्त तो बराबर दूर तक का नजर आयेगा मिस्ल उन गोश्तखोरो के जो शिकार करते हैं। जहर एक बीमारी है जिसमंे बनिस्बत रोशनी के अंधेरे में जयादा दिखलाई देता है और उसके असबाब जयादा तर यही हैं कि चंद रोज अन्धेरे मंे रहने का इत्तिफाक हुआ हो और रोशनी न दिखा हो। शिकार करने वाले जानवर अक्सर इसी तरह अंधेरे में रहते हैं तो अगर उन को भी यह बात हासिल हो कि वह शब में बनिस्बत दिन के जयादा देख सकते हैंं तो मुमकिन है ..............यह फितरत नही बीमारी है। गर्ज कि इन्सान इस बारे में बलिहाज फितरत उनसे जुदा नही हैं आँखों का गुस्से की हालत में चमकना इस अमर की दलील नही है कि रात में उन्हंें जयादा दिखलाई देता है। मैं इस े जवाब में आपका जयादा वक़्त लेना नहीं चाहता जबकि यह बात जाहिर है कि तमाम सब्जीखोर एक दूसरे से मुशाबहत नही रखते कोई सींघ रखता है कोई नही। कोई जुगाल करता है कोई नही करता। बावजूद इनमें इस क़दर इख़्तलाफ होने के सबको सब्जीखोर कहा जाता है। पस अगर गुस्से की हालत में या खास हालत में अगर इन्सान अपनी आँख न चमका सकता हो और जुमला गोश्तखोरो के मुतअल्लिक भी यह इल्म न हो कि वह अपनी आँख चमका सकते हैं। तो इस बे-दुम को गौश्त खोर न कहना सख्त तअज्जुब की बात होगी। खुलासा यह है अगर उस की आँख न भी चमके तो भी उस का नाम गोश्तखोरों की फहरिस्त से हरगिज खारिज नही किया जा सकता। शिकार मारने की बिना पर गोश्तखोर को जयादा देखने वाला क्यों कहते हो, रात में जिस क़दर काम वह कर सकते हैं हम भी सब काम कर सकते हैं । रात मंे वह चलते-फिरते हैं इन्सान भी चल फिर सकता है, वह रात में अपने से छोटे जानवर को खा जाते हैं। इन्सान भी अपने से बाराबर वाले का काम तमाम कर देता है।
शेर जो सबसे बडा गोश्तखोर है उसके शिकार पर गौर कीजिये आफताब गुरूब(शाम, दिन छिपने के समय) होने के करीब जो रात नहीं कहलाती........बाहर निकल कर किसी ऊँचे पहाड पर बैठ जाता है और वहाँ से चारों तरफ निगाह करता है। क्यूंकि वह वक़्त चोपायों(पशुओं) के मकान(ठिकाने पर) जाने का होता है। बस उनमें से जिनका वह शिकार करना चाहता है, उसी वक़्त से वह उसकी ताक में हो लेता है और जब मौक़ा पाता है पकड-कर चट कर जाता है। इस सूरत में कोई बात उनकी तेजी बसारत(दष्टि) की नही पाई गई और न रात में किसी किस्म का देखना जाहिर हुआ।
अलबत्ता जिस क़दर कु़व्वत(ताक़त) से यह गोश्तखोर काम लेते हैं इन्सान उस क़दर अपनी कु़व्वते शामा(सूंघने की ताकत) से नही ले सकता मगर दूसरे किसम के हेवान अपनी इस कु़व्वत से बहुत कुछ काम ले सकते हैं। चींटी इस तक़त के जरिये संदूक के अन्दर की चीज मालूम कर लेती है, सब्जीखोर जिनमंे से ऊँट सब से जयादा यह कु़व्वत रखता है मीलों से सूंघ कर पानी का पता लगा लेता है। घोडा जब किसी पानी के अन्दर घुसता है तो सूंघ कर उसकी गहराई मालूम कर लेता है।
हमारा एक तजुरबा है जिससे साबित होता है गोश्त खाने से  इंसान की कु़व्वते बासिरा(देखने, दृष्टि की ताक़त) कुछ बढी हुई है। अगर अन्धेरे मंे आप किसी कुत्ते या बिल्ली को एक लुक़्मा डालें तो वह उसे नाक से सूंघ कर तलाश करेेगा मगर आप नजर से उस को देख लेंगे बशर्तेकि जयादा अंधेरा न हो यह साफ दलील इस अमर की है कि इन्सान उन जानवरों से कुछ जयादा देखता है। और जो यह गोश्तखोर जानवर रात में कुव्वत शामा ही से काम लेते हों। पस आपका यह खयाल बिल्कुल ग़लत निकला कि इन्सान यह गोश्तखोर रात मंे जयादा देख सकते हैं और आपका यह दावा भी बिल्कुल ग़लत है कि गोश्तखोर दिन के वक़्त हमसे कम देखते हैं गालिबन आपने शिकारी कुत्ते और शिकारी चीते देखें होंगे यह मीलों के फासले से हिरन वगेरह को देख लेते हैं जिनको हम दूरबीन से देखकर उन्हें पकडने का इशारा करते हैं लिहाजा यह दावा भी आप का बातिल हुआ।
सवाल नम्बर 4
गोश्तखोरों से नबात यानि सब्जा खाने वाले बहुत डरते हैं और उनके पास नही जाते मगर इन्सान के पास सब आते हैं लेकिन इन्सान धोके से मार डालता है।
जवाब नम्बर 4
चलिये इस बात पर हमारा आपका फेसला आप अपने सुबूत को साबित किजिये कि अगर आपका पेश करदा सुबूत सही न हो तो आप का दावा हमारा सुबूत हो जायेगा। आप किसी एक सब्जीखोर को जो अपने असली वतन जंगल में हो आपका खानाजाद और आपका परवरदा यानि पाला हुआ या क़ैदी न हो उसको अपने पास बुला तो लिजिये कम से कम आप उसके पास तो चले जाइये अगर आप उसके पास तक चले गये और वह न भागा तो आपका दावा सही और अगर वह भाग गया तो समझा जायेगा कि वह डरता है और इस बिना पर आपको यह तस्लीम करना पडेगा कि आप गोश्तखोर हैं क्यांेकि आपने यही दावा किया है कि नबात खोर, गोश्तखोर के पास नहीं जाते डरते हैं, मैं तो इस बात का भी यक़ीन नहीं कर सकता कि आपके घर का पला हुआ भी कोई जानवर जिस को जंगल में कुछ जमाने से छोड दिया हो आपके बुलाने से आपके पास चला आये या आप उसके पास चले जायें और वह न भागे। उन पले हुए जानवरों की मिसाल क़ैदी की सी है जो रोज अपना काम करके वापस आ जाता हैं, इस खौफ से कि अगर भाग भी गया तो दौबारा क़ैद के अलावा सख़्त सजा भी दी जायेगी ।
अगर सब्जी यानि घांस, हरा चारा आदि खाने वालों का इन्सान के पास चले आना इस अमर की दलील समझी जाती है कि इन्सान सब्जीखोर है तो इन्सान के पास गोश्त खाने वालों का चले आना इस बात की दलील होना चाहिये कि इन्सान गोश्तखोर है और यह बात  रोजे रौशन की तरह है कि रात दिन गोश्तखोर कुत्ता, बिल्ली वगैरह इंसान के पीछे-पीछे फिरते हैं। बगैर पाले हुए घरों के नजदीक रहते हैं रात को जंगली गोश्तखोर बस्तिेयों के इर्द गिर्द चक्कर लगाते हैं बरअक्स इसके एक भी सब्जीखोर इन्सान के पास बगैर पाला हुआ नहीं आता और न वह बगैर पाला हुआ हमारे शहर मंे रहता है(हिरन जंगली गाये, बारह सिंग्गा वगैरह) और न इर्द-गिर्द चक्कर लगाता है और न बस्तियों में आकर घर बनाता है। जनाब जो उसूल आपने इन्सान के नबातखोर होने के लिये बयान किया था। उससे इन्सान नबातखोर साबित न हुआ बल्कि गोश्तखोर साबित हो गया यही है सच्चाई की दलील।
सवाल नम्बर 5
गोश्त खाने वाले गोया गोश्त का पेवंद अपने ऊपर चढाते हैं तो उनमें हेवानियत का असर आ जाता है इसलिए गोश्त न खाना चाहिये।
जवाब नम्बर 5
यह आपने खूब ही कहा। आप के सवाल का पहला हिस्सा यानी यह कि इन्सान गोश्त का पेवंद अपने ऊपर चढाता है बिल्कुल सही है। इन्साफ कीजिये कि मिस्ल का मिस्ल के साथ पेवंद लगाना मुनासिब है या गेर-मिस्ल का पेवंद सही है (जिस तरह का कपडा होता है उसी किसम या उसी तरह के कपडे का पेवंद लगाना पसंद किया जाता है)  मगर यह बात गोश्त खाने से हासिल होती है लिहाजा गोश्त ही खाना चाहिये दुसरा हिस्सा इस सवाल का अजीब है मालूम नही कि हेवान के आपने क्या अर्थ माना समझे हैं । हेवान सब ही हैं हेवानियत कोई ऐब की बात नही हेवान के माना हैं जिंदा शय(वस्तु) के कि हर इंसान हेवान हो सकता है फिर यह क्या कहा कि हेवानियत का असर गोश्त खाने वालों में गाये बकरी की तरह घास-पात चरने की आदत हो जाती है। यह कौनसी हेवानियत है जो इनके गोश्त के साथ गोश्त खाने वालों में असर कर जाती है, क्या गोश्त खाने वालों के सींघ निकल आते हैं या दुम पैदा हो जाती है या परिंदे का गोश्त खा कर उडने लगते हैं अगर आपके नजदीक यह बात साबित है कि गोश्त मंे आदत का असर शामिल होता है तो सब्जी खाने वाले इंसान भी गोश्तखोर हांेगे। और यह सब्जीखोरी का असर उन सब्जीखोर हेवानों के गोश्त खाने से आया होगा। बस आप हमको सब्जीखोर होने के लिये खूब गोश्त खिलाइये ताकि हम में जल्द यह असर न आ जाये और हम भी आप के से सब्जीखोर हो जायें अगर आपका दावा और दलील सही है तो आईंदा से आप बजाये गोश्तखोरी की मुमानिअत के गोश्त खाने की तरगीब देंगे मगर ऐसा नही है अगर ऐसा होता तो शेर जो सब्जीखोरों पर बसर करता है आज चराहगाह में घास चरता नजर आता आप के तर्जे़ सवाल से यह समझा जाता है कि हेवानियत कोई खराब शय या बात है मगर हम पर उस का कोई बुरा असर नही हो सकता क्यांेंकि हम हेवानखोर नही बल्कि गोश्तखोर हैं जो बेजान चीज है। हम जिन्दा हेवान का गोश्त काटकर अगर खाते तो हेवानियत का श्ुाबा आप कर सकते थे। हाँ जो लोग दूध घी खाते हैं जो कि उनकी जिन्दगी में उनसे निकाला जाता है उन पर हेवानियत का शुबा हो सकता है। मैं इल्जाम उनको देता था कु़सूर अपना निकल आया। जिस बिना पर आप गोश्त को नाजायज बतलाने की कोशिश करते थे उसी दलील से उसका खाना जायज बल्कि जरूर साबित हुआ।
सवाल नम्बर 6
गोश्त खाने वाले हमबिस्तरी के वक़्त जुड जाते हैं और नबातखाने वाले अलग रहते हैं और इंसान भी अलग रहता है इसलिए मालूम होता हैै कि इन्सान गोश्त खोर नही है, जवाब मंे गिलेहरी पेश न हो।
जवाब नम्बर 6
ऐसा मालूम होता है कि यह पुराना सवाल कहीं और जगह भी पेश हुआ है  और इस के जवाब मंे गिलेहरी का नाम लिया गया होगा। इसलिए आपने पेशबंदी कर दी यह खुद ही शिकस्त है और उस गिलेहरी का नाम न पेश करने से यह बात साबित हो रही है कि इस अमर बात के क़ाबिल नहीं कि एक जानवर ऐसा है कि वह सब्जीखोर है और जुफ्ती के वक़्त जुड जाता है। गौया खुद ही आपने इस सुवाल का जवाब दे दिया है। आप मुतमईन रहिये कि हम गिलेहरी पेश न करेंगे  मानुष के जवाब में गेर-मानुष को पेश न करेंगे। जैसा कि आपने इस सवाल में इन्सान को महज एक काम के अन्दर कुत्ते-बिल्ली के मुशाबह न होने के बाइस गौश्तखुरदन से जुदा रखने की कोशिश की है बरअक्स जुगाली करने और जुगाली न करने वाली सब्जी खुरदन के निस्बत जुदाई का कोई ख्याल नही किया और न उनके सर के सींगों की तरफ निगाह डाली जिस से मसअला खुद बखूद हल हो जाता। अब हम मानुष की जगह जल-मानुष को पेश करते हैं जो मछली और मंेडक पर बसर करता है और बिल्कुल गोश्तखोर है। उस खास काम में इन्सान के मुशाबह(जैसा)है पस इंसान का उस वक़्त न जुडना क्योंकि सब्जी खाने वालों से मुशाबह (जैसा) समझा जाता है इस गोश्तखोर के मुशाबह(जैसा) क्यों नहीं हमंे समझा जाता है।
इसके अलावह इस जवाब मंे भी यही कहूँगा कि गोश्तखोर का यह फेअल (काम) अगर इन्सान के इस फेअल(कामा) से मुशाबहत नही रखता तो भी इंसान के गोश्तखोर न होने की दलील नहीं हो सकती क्योंकि इंसान सिर्फ गोश्त खाता है। और यह जानवर गोश्त के अलावह हड्डी भी खाते हैं तो कुछ फर्क़ भी होना चाहिये और जब यह नबात खुरदन में सींग वाले और गैर-सींग वाले जुगाली करने वाले  और जुगाली न करने वाले मौजूद हैं तो गोश्त खुरदन मे ंभी कुछ से कुछ फर्क़ हो जाये तो कौन-सी क़ाबिले एैतराज बात है पस यह बात साबित हुई कि इन्सान हर पहलू पर नजर डालने के बाद भी गोश्तखोर ही साबित हुआ।
सवाल नम्बर 7
आँतें गोश्तखोर की छोटी होती हैं और नबातखोर की लम्बी होती हैं 32 फुट की मसलन गाये भेंस वगैरा?
जवाब नम्बर 7
यह सवाल तो आपने बिल्कुल उल्टा कर दिया क्योंकि आप ही के क़ौल के मुताबिक इंसान गोश्तखोर साबित होता है क्योंकि इस की आँतें छाटी होती हैं मिस्ल गोश्त खोरों के।
सवाल नम्बर 8
बन्दर और लंगूर मिस्ल इन्सान के सूरत रखते हें और गोश्त नही खाते इस से मालूम हुआ कि इंसान गोश्तखोर नहीं है।
जवाब नम्बर 8
जल-मानुष बिल्कुल इन्सान के मुशाबह (जैसा) और गोश्त खाता है, बंदर और लंगूर चार पैर से चलते हैं इसलिए इंसान के मुशाबह(जैसे) नहीं मगर जल-मानुष दो पैर से चलते हैं इसलिए जयादा (जैसा, मिलता-जुलता) मुशाबहत रखता है और बन्दर एक क़िस्म की जुगाली भी करता है यानी अव्वल अपनी कुल खुराक हलक के पास थेली में जमा कर लेता है इसके बाद फुर्सत में खाता है इसलिए इन्सान की निस्बत नबात जैसे इसके अफआल मिलते हैं सिर्फ सुरत से क्या होता हे बल्कि अगर देखा जाये तो शेर की सूरत भी इन्सान की सूरत से बहुत मुशाबह(जैसी, मिलती-जुलती) होती है हत्ता कि दाढी तक शेर बब्बर की होती है ।
अगर खाने पर दारोमदार है तो बन्दर कच्ची खुराक खाता है इन्सान नहीं खा सकता, इसके अलावह बहुत-सी जंगल की ऐसी चीजें हैं जिनको यह बन्दर खाते हैं इन्सान नहीं खा सकता और इसी तरह बहुत सी चीजें यह नही खाते मगर इन्सान खाता है मसलन बन्दर संखिया खा लेता है और नही मरता, इन्सान अगर खाले तो हलाक हो जाता है बन्दर, रसमुलफार की आमीज शुदा रोटी को नीम के पत्तों में थोंडी देर दबा कर उसको खा लेता है, लिहाजा बंदर को इन्सान की महज सूरत की बिना पर, मुशाबहत नही देना चाहिये। और यह भी मालूम नही कि यह क़सदन नहीं खाता या फितरतन क्योंकि हिन्दू इसको क़सदन नही खाते फितरतन तो खा सकते हैं और क़दीम जमाने में खाते थे।
सवाल नम्बर 9
गोश्त खाने से गु़स्सा जयादा पैदा होता है और ग़ुस्सा हर मजहब मंे हराम है इसलिए गोश्त न खाना चाहिये।
जवाब नम्बर 9
वाजेह हो कि जो कु़व्वतें इन्सान को अता हुई हैं मिन्जुमला उनके एक कु़व्वत शोक़िया है जिस का तअल्लुक दिमाग़ से है उसकी दो किस्में है (1)शेहवानिया (2)ग़जबिया कुव्वत, शेहवानी का काम तलब मनाफे है और कु़व्वत ग़जबी का दफा जरर है, इस लिहाज से गुस्सा जिस्मे इन्सान के लिये बहतरीन और जरूरी चीज हुई गौर से सुनिये गुस्से को किसी मजहब ने हराम नहीं कहा बल्कि अलबत्ता उसका बेजा इस्तेमाल और बे-मौके तसर्रूफ हराम हो सकता है दुसरी मिसाल और सुनिये महज बोलना हराम नहीं झुट बोलना हराम है, देखना हराम नही मगर जो चीज मना है उसका देखना हराम है, झुट बोलना हराम होने की वजह से बोलना हराम नहीं हो सकता वगेरह-वगेरा। इसी तरह गुस्सा हराम नही बल्कि बे-जरूरत गुस्सा हराम है इसकी मिसाल एक तलवार जैसी समझिये जो अपनी हिफाजत के लिये रखी जाती है  और दुश्मन और जालिम का दफा उसका खास मक़सद होता है। पस अगर कोई खुद को उस से हलाक करले या किसी का नाहक ख़ून करदे तो यह अफआल हराम हुए न कि तल्वार का रखना यक़ीन है कि आप इस बयान से गुस्से की हक़ीक़त समझ गये होंगे और अब मुझे इस बात पर गुफ्तगू करना जरूरी न रहा कि गोश्त से जयादा गुस्सा पैदा होता है या नही क्योंकि अगर उसमे बक़ौल आपके गुस्सा जयादा होता भी हो तो भी गौश्त खाने की हुरमत गुस्सा जयादा पैदा होने की बिना पर साबित न हुई अगरचे यह कहना भी दुरूस्त नहीं है कि गोश्त बिलखास्सा गुस्सा जयादा पैदा करता है।
सवाल नम्बर 10
गोश्तखोर चौपाये दो-चार एक जगह इकठठे नही हो सकते  और नबात खाने वाले जैसे घोड़ा, गाये, हिरन, बन्दर वगै़रा एक जगह हजारों रह सकते हैं, इस से मालूम होता है कि इंसान गोश्तखोर नही है।
जवाब नम्बर 10
 इस सवाल को देख कर मुझ को सख़्त हैरत होती है जब कि उर्दु लुग़त (किक्शनरी) में एक लफ्ज झुंड मौजूद है जो गुर्ग (भेडिया, लाण्डगा) गीदड वगैै़रा की जमात के वास्ते बोला जाता है इसके अलावा जो इन्सान जंगल में फिरने वाले हैं उनसे दरयाफत करने से मालूम हो सकता है कि गीदड और भेडिया के झुण्ड के झुण्ड जंगल मे फिरते है या नहीं। खास इस शहर में रात के वक़्त जो गीदडों की आवाज सुनाई देती हैं इस से साफ जाहिर होता कि कई एक मुत्तफिक हो कर चींख़ रहे हैं। उन सबको जाने दीजिये आखि़र तो आप इस बात के क़ाइल होेगें कि एक सहरा मंे हजारांे जानवर रहते हैं इसी तरह इन्सान भी एक शहर में हजारों की तादाद मंे रहते हैं जिस तरह वह अलेहदा-अलेहदा भटार बना कर रहते हैं, इन्सान भी अलेहदा-अलेहदा मकान बना कर रहता है। अलबत्ता इन्सान कुछ नजदीक-नजदीक जगह की क़िल्लत की वजह से और कुछ-कुछ खास जरूरत की वजह से जैसे तालीम, ख़रीदो फरोख़्त, इबादतगाहें, अस्पताल वगेरा क्यूंकि उनकी खास जरूरत जानवरों की नहीं है और जगह भी काफी है। हिफ्जान-ए-सेहत का ख्याल भी उनको जयादा होता है इसलिए उनकी भटारें बनिस्बत हमारे मकानात के कुछ दूर-दूर होती हैं और सुनिये कि गोश्तखोर मकान बनाकर रहते हैं इन्सान भी मकान बना कर रहता है, मिस्ल चोपायों सब्जीखोरों के आसमान के साये तले बसर नहीं करता है। बल्कि गोश्त खुरदन की तरह भटार बना कर रहता है। यह बहुत बडी दलील इन्सान के गोश्तखोर होेने की है। अफसोस है कि आप का हर सवाल आप ही के लिये उल्टा सवाल और एक भी सही न साबित हुआ अब अगर आईंदा कोई सवाल करना हो तो सोच समझ कर कीजिये इस रूसवाई से क्या फायदा आप के सवालात के जवाबात ख़त्म हुए। अब आप बहुत जल्द इन जवाबात के मुतअल्लिक अपनी राये तहरीर फरमायें अगर इत्मिनान न हो तो मजीद इत्मिनान के लिये मैं तैय्यार हूं।
अब आपसे हमारे तीन सवालात
(1) गोश्त खुरदन के बच्चे पैदा होने के बाद रफता-रफता चलने-फिरने के क़ाबिल होते हैं, जैसे शेर, बिल्ली, चीता वगै़रा। सब्जी खूरदन के बच्चे पैदा होते ही चलने फिरने लगते हैं जैसे गाये बकरी हिरन वगै़रह।
चुंकि इन्सान का बच्चा पैदा होने के बाद रफता-रफता चलने फिरने के क़ाबिल होता है इसलिए मालूम होता है कि वह फितरतन गोश्त खोर है अगर वह गोश्तखोर नहीं है तो क्यों नही मिस्ल सब्जीखोर के पैदा होते ही चलने फिरने लगता है।
(2) जिस क़दर गोश्तखोर है उनके बच्चे पैदा होने के बाद अव्वल पाखाना फिरते हैं मगर नबात खोर के बच्चे पैदा होने के बाद अव्वल पैशाब करते हैं इन्सान का बच्चा चूंकि पैदा होने के बाद अव्वल पाखाना फिरता है लिहाजा यह गोश्तखोर है।
(3) गोश्तखोर भटार बना कर रहते हैं और सब्जी खोर खुले मैदान या दरख़त(पेड) के नीचे बसर करते हैं इन्सान भटार बना कर मकान में रहता हे लिहाजा गोश्तखोर (मांसाखोर, मांसाहारी) है ।  फक्‍त